शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

छापक पेड़ छिउलिया

छापक पेड़ छिउलिया त पतवन धनवन हो
तेहि तर ठाढ़ हिरिनिया त मन अति अनमन हो।।

चरतहिं चरत हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो
हरिनी ! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझेलु हो।।

नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो
हरिना ! आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो।।

मचियहिं बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो
रानी ! मसुआ त सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू नू हो।।

पेड़वा से टाँगबो खलरिया त मनवा समुझाइबि हो
रानी ! हिरी-फिरी देखबि खलरिया जनुक हरिना जियतहिं हो

जाहु हरिनी घर अपना, खलरिया ना देइब हो
हरिनी ! खलरी के खँजड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहेनू हो।।

जब-जब बाजेला खँजड़िया सबद सुनि अहँकेली हो
हरिनी ठाढि ढेकुलिया के नीचे हरिन के बिजूरेली हो।।

विद्यानिवास मिश्र द्वारा सम्पादित कृति "वाचिक कविता भोजपुरी" से साभार
(यह बहुत ही मशहूर सोहर है, हरिणी से हरिण एक प्रश्न पूछता है की वह उदास क्यों हैं। हरिणी उत्तर दे रही है कि आज कोसल नरेश के यहाँ छठीहार है और हरिण को छट्ठी के लिए मार डाला जाएगा। बाद में हरिणी और कौसल्या का संवाद है जहाँ हरिणी रानी से हरिण की खाल मांगती है जिससे वह उसे याद के रूप में अपने पास रख सके लेकिन कौसल्या ने यह कहते हुए की उसकी खाल से खंजड़ी बनाई जायेगी जिससे उनका लाल राम उससे खेल सके हरिणी को निराश होकर लौटना पड़ा। और जब-जब खंजड़ी बजती है हरिणी के मन में टीस उठती है)

वाह ! बनारस

छूटा दगा दुमकटा साँड़
सींग रहित कनफटा सांड़
मंदिर, गली सड़क घाटों पर
दो चार गऊ संग डटा साँड़
भिड़ पड़े खोंमचा उधर गिरा
हुरपेटा कोई इधर गिरा
ढुर छें ढुर छें में पता नहीं
कब कौन आदमी किधर गिरा
कुछ ने मोटे को पुचकारा
कुछ ने दुबले को लरकारा
फिर क्या था साँड़ों के पीछे
हो गयी वहीं मारी मारा
एकदम बरबस
वाह ! बनारस

बैठे साव पुरोहित पंडा
ले ले छड़ी अंगोछा डंडा
‘बोल दे रजा राम’ चले पट्ठे
गहरेबाज पटनहा मुण्डा
इक्के राजघाट पुल आये
घोड़ों ने डैने फैलाये
मची करारी गहरेबाजी
भिड़ल रहे बस जाय न पाये
लऽरंगभंग पड़ गयल खलल
कुछ चित्त गिरे, कुछ मुँह के बल
फिर भी मुँह से था निकल रहा
बस खबरदार ! सब रहे हटल
अद्भुत साहस
वाह ! बनारस।

विश्वंभरनाथ त्रिपाठी की रचना "आज भी वही बनारस है" से साभार

पुरुष-सूक्त : अँधेरे की ऋचा

वह एक समय था।
मैं पहाड़ों से चाँदनी की तरह उतरा करती थी
और मैंदानों में नदी की तरह फैल जाती थी
मेरे अन्दर हिम-संस्कृति की गरिमा थी
और हरे दृश्यों की पवित्रता।

मैं प्रेम करना चाहती थी
और रास्ते के
उस किसी भी पेड़, टेकरी या पहाड़ को
गिरा देना चाहती थी
जो मेरी रुकावट बनता था।
वह पेड़ भाई हो सकता था
वह टेकरी बहिन
और वह पहाड़ पिता हो सकता था।

मैं उन्हें याद करती हूँ
व्यक्तिगत अंक से कटे हुए शून्यों की तरह-अपने
प्रेमी या प्रेमपात्रों को,
वे एक या दो या तीन या
असंख्य भी हो सकते हैं।
उनके शरीर पर कवच थे
और पैर घुटनों तक जूते में बँधे थे
उनके सिर पर लोहे के टोप थे
और उनकी तलवारें अपशब्दों की तरह थीं—
जिन्हें वे हवा में उछालते हुए चलते थे।

वे अपने और अपनों के हितों के बारे में
आशंकित रहने वाले लोग थे।
जब कभी
उनकी रोटी, शराब या औरत में
कोई चीज़ कम हो जाती थी
तो वे छाती कूट कर रोते थे
वे अपने मरे हुए पुरखों की उन रातों के लिए भी रोते थे
जो उन्होंने घरेलू कलह के दौरान
औरतों के बिना गुज़ारी थीं
और उनके वंशजों के लिए भी
जिनके पास रोटी तो थी
पर जो अभी शराब और औरत नहीं जुटा पाये थे।

वे शामों और समुद्रों की
तटवर्ती आसक्तियों में प्रवृद्ध हुए लोग थे
गुलाबों और रजनीगन्धा की झालरों में
बार-बार मूर्च्छित होने वाले लोग।

दौड़कर आयी हुई नदी के किनारे
उन्होंने अपनी छतरियाँ तानी थीं
ताकि ठण्डी हवा के झोंकों के बीच
अपना घरेलू चन्दन घिस सकें
और मलबा फेंकने के लिए भी
उन्हें दूर न जाना पड़े।

प्रेम उनके लिए
कभी खिड़की से देखा जानेवाला एक सुन्दर भू-दृश्य होता
कभी भागकर छिपने के लिए मिला
एक निभृत स्थान।
वह नहीं था
धरती में रोपा जानेवाला कोई पौधा
या कोई लतर
जिसे श्रम के जल से सींचना ज़रूरी हो।
जब भी हवा या आकाश की बात होती
वे उसे उस क्षण की अपेक्षा से काटकर
किसी सुदूरवर्ती स्वप्न में ले जाते।

वे प्रकृति के निर्जन सन्नाटों में चल रहे
अभियानों की खबरों से भी जी चुराते थे
कि हस्तगत प्रेमिका की तरफ़ से, जीवन में
किसी भी साहसिक चेतावनी के ख़तरे को
आख़िर तक टाला जा सके।

वे एक ही सम्प्रदाय के लोग थे।
उनकी बातों और आदतों को शायद कहीं अलग किया जा सके
पर उनका स्मृति-प्रभाव
बिना किसी आश्चर्य के एक जैसा है।

वे आज भी ज़िन्दा हैं
सबके भविष्य को
अपने वर्तमान में निचोड़नेवाले लोग
बहते हुए रक्त की यन्त्रणापूर्ण रोशनी से
अपनी नावें सजानेवाले लोग।

वे हमेशा ज़िन्दा रहते हैं।

उन्होंने मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहा था
और कच्चे-से काँटे को सूली की संज्ञा दी थी।

मैंने विश्वास की पवित्र शिला पर खड़े होकर
अपने जीवन की आग पर पानी डाला था 

अमृता भारती की पुस्तक "सन्नाटे में दूर तक" से साभार

कैलाश गौतम की "कविता लौट पड़ी"

उतरे नहीं ताल पर पंछी

उतरे नहीं ताल पर पंछी
बादल नहीं घिरे
हम बंजारे
मारे-मारे
दिन भर आज फिरे।

गीत न फूटा
हँसी न लौटी
सब कुछ मौन रहा,
पगडन्डी पर आगे-आगे
जाने कौन रहा
हवा न डोली
छाँह न बोली
ऐसे मोड़ मिले।

आर-पार का न्योता देकर
मौसम चला गया
हिरन अभागा उसी रेत में
फिर-फिर छला गया
प्यासे ही रह गये
हमारे
पाटल नहीं खिले।

मन दो टूक हुआ है
सपने
चकनाचूर हुए
जितनी दूर नहीं सोचे थे
उतनी दूर हुए
रात गये
आँगन में सौ-सौ
तारे टूट गिरे।

बारिश में घर लौटा कोई

बारिश में घर लौटा कोई
दर्पण देख रहा
न्यूटन जैसे पृथ्वी का
आकर्षण देख रहा।
धान-पान सी आदमकद
हरियाली लिपटी है,
हाथों में हल्दी पैरों में
लाली लिपटी है
भीतर ही भीतर कितना
परिवर्तन देख रहा।

गीत-हँसी-संकोच-शील सब
मिले विरासत में
जो कुछ है इस घर में सब कुछ
प्रस्तुत स्वागत में
कितना मीठा है मौसम का
बंधन देख रहा।

नाच रही है दिन की छुवन
अभी भी आँखों में,
फूलझरी सी छूट रही है
वही पटाखों में
लगता जैसे मुड़-मुड़ कोई
हर क्षण देख रहा।

दिन भर चाह रही होठों पर,
दिन भर प्यास रही
रेशम जैसी धूप रही
मखमल सी घास रही
आँख मूँदकर
सुख
सर्वस्व समर्पण देख रहा।

लोकभारती प्रकाशन के "कविता लौट पड़ी" संग्रह से

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

नया वर्ष




इक
महती उपलब्धि
उस चीज की
जो स्वयं गतिवान है !
इक गहरी उतेजना
उसके आने की
जिसको आना ही है !

ये समय नहीं है -
अपने पीछे देखने का ,
न ही आगे आनेवाले
ढकोसलों को मापने का
ये समय है -
एन्जोए करने का !

हर उस तेज़ चीज़ को
हम हड़प कर जायेंगे
हर पानी हमारे लिए
एक खास शराब है ,
वो जो भी खारा है
हमें प्यारा है !

शव के सिरहाने रखी
ज़िन्दगी -
धीरे - धीरे सुलगती हुई बाती है
औ' सारे के सारे रंगों का
अबूझ कफ़न ओढे है !

नहीं , ये समय नहीं है
न ही उसकी आहट ,
जिसको हम माप सके
या की अपनी ही बनाई
खिड़की से छांक सकें !

एक रोकेट तेज़ी से जाता है
कहीं दूर कोई सीटी बजाता है ,
कोई नाचता कोई गाता है !
पूरा का पूरा माहौल
इस ठण्ड में
खिलंदर बन जाता है !

मुझे याद है -
बचपन में ,
हम एक चकरी बनाते थे
पत्तों की
औ' उसे लेकर हवा के विपरीत
तेज़ी से दौड़ते थे
वो घूमती थी
हम खुश होते थे !

वो समय की खूबी थी
या हमारी मेहनत की ,
की चकरी तेज़ी से घूमती थी
मुझे नहीं पता ;
हाँ ! इतना जरुर पता है
इस खेल की रेलमपेल में
सब शामिल हैं !
इस कड़ाके की टंड में
जो आइस्क्रेम खायेगा ,
टीक वही -
"सर्विवल ऑफ दी फिटेस्ट "
बन पायेगा ,
अब कोई भूख से नहीं
कम खाने की इच्छा से
मारा जायेगा !!!


अभिषेक पाण्डेय
०१/०१/२००३
न्यू डेल्ही

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

बिरिया सी झोर लइ - बुन्देली कविता

शिवानन्द मिश्र 'बुंदेला' बुन्देलखण्ड के प्रसिद्द कवि रहे हैं। उन्होंने बुन्देली भाषा को विशेष पहचान देने के लिए सदैव प्रयास किये।
इनकी बुन्देली कविता ‘बिरिया सी झोर लइ’ ने बुन्देला जी को तथा बुन्देली भाषा को नई पहचान दी। यहाँ आपकी यही कविता प्रस्तुत है-

तुरकन ने तिली सी अकोर लइ, गोरन ने गगरी सी बोर लइ।
अब अपने भारत के भैंयन ने, परजा कों बिरिया सी झोर लइ।
नेतन की बातन में घातें हैं।
इनके हैं दिन हमाईं रातें हैं।
मारपीट गारिन को समझत जे,
सब दुधार गैया की लातें हैं।
राजनीति कों तनक मरोर लइ, ढेर भरी सम्पदा अरोर लइ।
अब अपने भारत के भैंयन ने परजा कों बिरिया सी झोर लइ।
आउते जो गाँव उर गमैंयन में।
बैठते टिराय चार भैंयन में।
सांचो सो रामराज हुइ जातो,
गाउते मल्हार उन मड़ैंअन में।
कील कील जितै की तंगोर लइ, बूंद-बूंद रकत की निचोर लइ।
अब अपने भारत के भैंयन ने परजा कों बिरिया सी झोर लइ।
दओ उसेय पुलिस की पतेली ने।
लओ उधेर मुंसपी तसीली ने।
लील्हें सब लेत हैं किसानइं कों,
चींथ खाओ जजी ने वकीली ने।
मका केसी अड़िया चिथोर लइ, सहद की छतनियां सी टोर लइ।
अब अपने भारत के भैंयन ने परजा कों बिरिया सी झोर लइ।
दूध घी निकारें हम देहाती।
कतर कतर करब पक गई छाती।
मोंड़न के पेट काट बेंचत हैं,
खाय खाय बूस गये शहराती।
मिली तो महेरिअइ भसोर लइ, अमिअंन की गुठलिअइ चचोर लइ।
अब अपने भारत के भैंयन ने परजा कों बिरिया सी झोर लइ।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

इत्तफाक...

आज इत्तफाक से टकरा गई अपने आप से
ऐसा लगा बरसों बाद मिली हूं किसी बिछड़े यार से
"तुम तो दिखाई ही नहीं देते"  कहकर मैंने शिकायती लहजे में बात शुरू की थी
"रहने दो अब हमारे लिये तुम्हारे पास वक्त कहां" से किया था मैने ही अंत भी
मेरी बातों से नाराज़गी साफ झलक रही थी
और उसकी हर एक बात मुझे शांत करने की एक पहल दिख रही थी
बातों का कारवां निकल पड़ा
समय का जैसे अंदाजा ही ना था
थक सी गई थी मै भी इस दौड़भाग भरी ज़िंदगी से
एक सूकुन सा मिला था
किसी अपने से मुखातिब हुई थी...भले ही देर से
"फिर जल्द मिलना" कहकर मैंने घड़ी की तरफ देखा था
और ये कहकर मैं अपने आप से नज़रें नहीं मिला पाई थी
अंदर का दुख कब आंसू बनकर आंखों तक आ गया था
ये तब पता चला जब घड़ी की सूई और सब कुछ धुंधला सा दिखा था
चलते चलते एक ख्याल मन में आया था
क्या सच में मेरे पास इतना वक्त नहीं था?
भाग रही थी अपने ही आप से शायद ये एक कड़वा सच था..

शनिवार, 2 जनवरी 2010

नए साल की शुभकामनाएं !

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं !

जांते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएं !

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएं !

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएं !

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएं !

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएं !

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएं !

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

आग


आग का पेट बड़ा है!
आग को चाहिए हर लहजा चबाने के लिए
खुश्क करारे पत्ते,
आग कर लेती है तिनकों से गुजारा लेकिन
आशियानों को निगलती है निवालों की तरह
आग को सब्ज हरी टहनियां अच्छी नहीं लगतीं
ढूंढती है कि कहीं सूखे हुए जिस्म मिलें!
उसको जंगल की हवा रास आती है फिर भी
अब गरीबों की कई बस्तियों पर देखा है हमला करते,
आग अब मंदिरों-मस्जिद की गजा खाती है!
लोगों के हाथों में अब आग नहीं-
आग के हाथों में कुछ लोग हैं अब

गुलजार

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

क्या हम आजाद हैं?

वक्त ऐसा आ गया है
आलम ऐसा छा गया है
झाँक कर अपने गिरेबान में

आओ ख़ुद से पूछ लें
क्या हम आजाद हैं?

क्या है जिंदगी में अमन चैन?
क्यूँ दो शाम की रोटी के लिए तरसे नैन?
क्या अपना हक मिलता है यहाँ?
लोकतंत्र चलता है जहाँ?

आओ ख़ुद से पूछ लें
क्या हम आजाद हैं?

भुखमरी बेरोज़गारी और अन्याय से क्या अछूते हैं हम?
क्या ठोस कदम उठाये सरकार ने जिससे हो हमारी परेशानी कम?
काम होता है यहाँ और योजनायें बनती भी हैं
पर क्या कभी सोचा है वो क्यूँ लागू होती नहीं?

आओ ख़ुद से पूछ लें
क्या हम आजाद हैं?

क्यूँ वो सुनकर भी हमारी बात करते अनसुनी?
क्यूँ हमारा दर्द उनको दर्द देता है नहीं?
क्यूँ हमारे आसुओं का होता कोई असर नहीं?

आओ ख़ुद से पूछ लें
क्या हम आजाद हैं?

वक्त ऐसा आ गया है
आलम ऐसा छा गया है
झाँक कर अपने गिरेबान में

आओ ख़ुद से पूछ लें
क्या हम आजाद हैं?

हर एक इंसान में है ज़ोर कर लो गौर
अब करे न राज हमपे कोई और
अपने हाथों में ले लो सत्ता की डोर

और हर तरफ़ हो यही शोर
"हाँ हम आजाद हैं.....हाँ हम आजाद हैं...."

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

लोकेशन

























अभी कल तलक
कहते थे-
नहीं होने देंगे अन्याय
लडेंगे अत्याचारी से
झोपड़ी और गगन चूमती
एसीदार इमारतों के बीच
कर देंगे खत्म फासला
आज वह भी,
उन्हीं लोगों की जमात में
हो गए हैं शामिल
सबसे आगे चल रहे हैं उठाकर
उनका झंड़ा
उसी एसीदार इमारत पर
ले लिया है फ्लैट
बालकनी में खडे़ होकर
देखता है झोपड़ी की तरफ
जहां से उठकर आया है
अब खटक रही है उसे
अपने बगल में
उस झोपड़ी की लोकेशन।

भागीरथ




आकस्मिक मुलाकात


हम मिले-
बड़े सलीके और शिष्टाचार के साथ।
हमने कहा- कितनी खुशी हुई
आपको इतने सालों बाद देखकर !
पर हमारे भीतर थककर सो गया था बहुत-कुछ।
घास खा रहा था शेर,
बाज ने अपनी उड़ान छोड़ दी थी।
मछलियाँ डूब गई थीं और भेड़िए पिंजरों में बन्द थे।
हमारे साँप अपनी केंचुल बदल चुके थे।
मोरों के पंख झड़ गए थे।
उल्लू तक नहीं उड़ते थे हमारी रातों में।
हमारे वाक्य टूट कर ख़ामोश हो गए।
असहाय-सी मुस्कान में खो गयी
हमारी इंसानियत
जो नहीं जानती कि आगे क्या कहे
विस्साव शिम्बोर्स्का
(बीतती सदी में )
अनुवाद - विजय अहलूवालिया

घुटनों के बल निहार रहा हूँ धरती को

इंसानों के बीच प्यार करता हूँ इंसानियत को
मुझे भाती है सक्रियता
मुझे रुचते हैं विचार
प्यार करता हूँ मैं अपने संघर्षो को
मेरे संघर्षो के बीच इंसान हो तुम मेरी प्रिया
मैं तुम्हे प्यार करता हूँ!
नाज़िम हिक़मत

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

आदत

अब नहीं वो गुस्सा करते
भाड़ा बढ़ने पर बस का
आटा-दाल-चीनी-सब्जी
महंगी होने पर
नहीं शिकन आती माथे पर
अब वो आदत डाल रहे हैं
पैदल चलने की
हवा खाकर जिंदा
रहने की..

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी

मुझे अपने ख़्वाबों की बाहों में पाकर

कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी

उसी नींद में कसमसा कसमसाकर

सराहने से तकिये गिराती तो होगी

वही ख्वाब दिन के मुंडेरों पे आके
उसे मन ही मन में लुभाते तो होंगे
कई साज़ सीने की खामोशियों में
मेरी याद में झनझनाते तो होंगे
वो बेसाख्ता धीमे धीमे सुरों में
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी
चलो ख़त लिखें जी में आता तो होगा
मगर उंगलियाँ कंप-कंपाती तो होंगी
कलम हाथ से छूट जाता तो होगा
उमंगें कलम फिर उठाती तो होंगी

मेरा नाम अपनी किताबों पे लिखकर
वो दांतों में उंगली दबाती तो होगी
जुबां से कभी उफ़ निकलती तो होगी
बदन धीमे धीमे सुलगता तो होगा
कहीं के कहीं पाँव पड़ते तो होंगे
दुपट्टा ज़मीन पर लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बताती तो होगी

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी

रविवार, 6 दिसंबर 2009

कश लगा

ज़िन्दगी ऐ कश लगा
हसरतों की राख़ उड़ा

ये जहान फ़ानी है, बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या, पानियों पे बहता जा बहता जा
कश लगा, कश लगा

जलती है तनहाईयाँ तापी हैं रात रात जाग जाग के
उड़ती हैं चिंगारियाँ, गुच्छे हैं लाल लाल गीली आग के

खिलती है जैसे जलते जुगनू हों बेरियों में
आँखें लगी हो जैसे उपलों की ढेरियों में

दो दिन का आग है ये, सारे जहाँ का धुंआँ
दो दिन की ज़िन्दगी में, दोनो जहाँ का धुआँ
कश लगा, कश लगा

इश्तहार

इसे पढ़ो
इसे पढ़ने में कोई डर या ख़तरा नहीं है
यह तो एक सरकारी इश्तहार है
और आजकल सरकारी इश्तहार
दीवार पर चिपका कोई देवता या अवतार है
इसे पूजो !
इसमें कुछ संदेश हैं
सूचनाएँ हैं
कुछ आँकड़े हैं
योजनाएँ हैं
कुछ वायदे हैं
घोषणाएँ हैं
इस देववाणी को पढ़ो
और दूसरों को पढ़कर सुनाओ—
कि देश कितनी तरक्की कर रहा है
कि दुनिया में हमारा रुतबा बढ़ रहा है
चीज़ों की कीमतें गिर रही हैं
और हमें विश्व बैंक से नया क़र्ज़ा मिल रहा है
इस क़र्ज़ से कई कारखाने लगाए जाएंगे
कारखानों से कई धंधे चलाए जाएंगे
उन धंधों से लाखों का लाभ होगा
उस लाभ से और कारख़ाने लगाए जाएंगे
उन कारख़ानों से और उद्योग चलाए जाएंगे
उस लाभ से और कारख़ाने लगाए जाएंगे
इस तरह लाभ—दर—लाभ के बाद
जो शुभ लाभ होगा
उससे ग़रीबों के लिए घर बनाए जाएगे
उन पर उन्हीं की शान के झंडे लहराए जाएंगे
सभी ग़रीब एक आवाज़ से बोलें—
‘जय हिंद !’
ये हिंद साहब !
मगर इस देश का ग़रीब आदमी भी अजब तमाशा है
अपनी ही शान का इश्तहार पढ़ने से डरता है
और निरंतर निरक्षर होने का नाटक करता है
हाँ साहब, मैं ठीक कहता हूँ
अगर देश को ठीक दिशा में मोड़ना है तो
ग़रीब आदमी की इस नाटकीय मुद्रा को तोड़ना है
हमें उसे ज़बर्दस्ती इस दीवार के पास लाना है
और इस इश्तहार को पढ़वाना है।

कविता आदमी का निजी मामला नहीं है

कविता आदमी का निजी मामला नहीं है

एक दूसरे तक पहुंचने का पुल है
अब वही आदमी पुल बनाएगा जो पुल पर चलते आदमी की

सुरक्षा कर सकेगा।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

आज सड़कों पर लिखें हैं सैंकड़ों नारे न देख

आज सड़कों पर लिखें हैं सैंकड़ों नारे न देख,
घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहाँ दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाजुओं को देख, पतवारें न देख।

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,
यह हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख।

वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख।

दिल को बहला ले, इजाजत है, मगर इतना न उड़,
रोज सपने देख, लेकिन इस कदर प्यारे न देख।

ये धुँधलका है नजर का, तू महज मायूस है,
रोजनों को देख, दीवारों में दीवारें न देख।

राख, कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियाँ ही देख, अंगारे न देख।
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दुष्यंत कुमार

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा


ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।

यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सब-के-सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा।

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,
कि इन्सानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा।

कई फ़ाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में,
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा।

यहाँ तो सिर्फ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं,
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

चलो, अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें,
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।
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दुष्यंत कुमार