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सोमवार, 27 जुलाई 2009

एक कम है

अब एक कम है तो एक की आवाज कम है

एक का अस्तित्व एक का प्रकाश

एक का विरोध

एक का उठा हुआ हाथ कम है

उसके मौसमों के वसंत कम हैं


एक रंग के कम होने से

अधूरी रह जाती है एक तस्वीर

एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश

एक फूल के कम होने से फैलता है उजाड़ सपनों के बागीचे में


एक के कम होने से कई चीजों पर फ़र्क पड़ता है एक साथ

उसके होने से हो सकनेवाली हजार बातें

यकायक हो जाती हैं कम

और जो चीजें पहले से ही कम हों

हादसा है उनमें से एक का भी कम हो जाना


मैं इस एक के लिए

मैं इस एक के विश्वास से

लड़ता हूं हजारों से

खुश रह सकता हूं कठिन दुःखों के बीच भी


मैं इस एक की परवाह करता हूं ।

कुमार अंबुज

कहीं भी कोई कस्बा

अभी वसंत नहीं आया है

पेड़ों पर डोलते हैं पुराने पत्ते

लगातार उड़ती धूल वहाँ कुछ आराम फरमाती है


एक लम्बी दुबली सड़क जिसके किनारे

जब-तब जम्हाइयाँ लेती दुकानें

यह बाज़ार है

आगे दो चौराहे

एक पर मूर्ति के लिए विवाद हुआ था

दूसरी किसी योद्धा की है

नहीं डाली जा सकती जिस पर टेढ़ी निगाह


नाई की दुकान पर चौदह घंटे बजता है रेडियो

पोस्ट-मास्टर और बैंक-मैनेजर के घर का पता चलता-फिरता आदमी भी बता देगा

उधर पेशाब से गलती हुई लोकप्रिय दीवार

जिसके पार खंडहर, गुम्बद और मीनारें

ए.टी.एम. ने मंदिर के करीब बढ़ा दी है रौनक


आठ-दस ऑटो हैं रिेक्शेवालों को लतियाते

तांगेवालों की यूनियन फेल हुई

ट्रैक्टरों, लारियों से बचकर पैदल गुज़रते हैं आदमी खाँसते-खँखारते

अभी-अभी ख़तम हुए हैं चुनाव

दीवारों पर लिखत और फटे पोस्टर बाक़ी


गठित हुई हैं तीन नई धार्मिक सेनाएँ

जिनकी धमक है बेरोज़गार लड़कों में


चिप्स, नमकीन और शीतल पेय की बहार है

पुस्तकालय तोड़कर निकाली हैं तीन दुकानें

अस्पताल और थाने में पुरानी दृश्यावलियाँ हैं

रात के ग्यारह बजने को हैं

आखिरी बस आ चुकी

चाय मिल सकती है टाकीज़ के पास


पुराना तालाब, बस स्टैंड, कान्वेंट स्कूल, नया पंचायत भवन,

एक किलोमीटर दूर ढाबा

और हनुमान जी की टेकरी दर्शनीय स्थल हैं।

कुमार अंबुज