शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

राष्ट्रगीत

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है.

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है.

पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,
उनके
तमगे कौन लगाता है.

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है.

रघुवीर सहाय

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत बहुत बहुत सुन्दर ही नही बल्कि अदभूत है आपकी रचना........धन्यावाद

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  2. किन शब्दों में आपके इस रचना की प्रशंशा करूँ समझ नहीं पा रही......

    अद्भुद ! अद्वितीय ! अतिसुन्दर ! आपकी इस रचना ने मंत्र मुग्ध कर दिया....बहुत बहुत आभार ,पढवाने के लिए...

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  3. "jay he" kisaki....isase achha to hai "jay ho".

    AR Rahman ne shayd Raghuvir ji ki isi rachna ko padh kar "jay ho" ki kalpna ki hogi.

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  4. agar "jai ho" ragubir ji se prerit thi to "bhay ho" nischit roop se "jai ho" se prerit hui ! iska matlab jai aur bhay ek dusre ki poorak hui?

    ek line mujhe dhyan aa rahi hai ---
    "bhay bin hoai na preet"
    iski prerna ka kuch surag lage to hame bhi batayen.

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  5. प्रिय ओ़म एवं रंजना,
    आपका इतना प्यार भरा कमेन्ट पढ़कर रघुबीर सहाय जी अगर आज जीवित होते तो इस कमेन्ट पर एक-आध कविता लिख मरते.

    फिलहाल ये कमेन्ट सिर्फ दो बातो के लिए है
    पहला यह बताने के लिए की कविता स्वर्गीय रघुबीर सहाय की है
    और दूसरा की आप जैसे कविता के पारखी को हमारे ब्लॉग का मेंबर जरुर होना चाहिए.

    बहरहाल ओ़म अगर आप अपना मेल एड्रेस भेज दे तो आपको invitation भेज दूं. आपके profile में आपका mail address नहीं हैं

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  6. bilkul thik kaha neeraj ne aap jese log hi hamare blog ke shaan banege.

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